मेरे बचपन की सबसे खूबसूरत यादों में से एक मेरी भाषा की कक्षाएँ हैं। बचपन से ही मुझे हिंदी और कोंकणी की क्लासेस का इंतज़ार रहता था। खासकर जब बात आती थी कहानी लिखने की या निबंध लिखने की—तो जैसे मेरे अंदर की दुनिया खुल जाती थी।
मेरे लिए लिखना सिर्फ़ एक असाइनमेंट नहीं था, बल्कि एक ऐसा स्पेस था जहाँ मेरे विचार, मेरी कल्पना और मेरी कहानी कहने की क्षमता खुलकर सामने आती थी।
इस याद से जुड़ी एक खास बात यह भी है कि मेरी माँ मेरी ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा में हिंदी की शिक्षिका थीं। मम्मी की एक खासियत थी – उन्हें अपने सभी विद्यार्थियों के नाम याद रहते थे। चाहे छात्र किसी भी बैच के हों, वे उन्हें नाम से पहचानती थीं। उनकी कक्षाएँ हमेशा इतनी जीवंत और दिलचस्प होती थीं कि बच्चे अपना सारा ध्यान वहीं लगा देते थे।
लेकिन एक चीज़ थी जो उन्हें बहुत स्पेशल बनाती थी—उनकी कहानी सुनाने की अद्भुत क्षमता।
मुझे आज भी ग्यारहवीं कक्षा का एक दिन बहुत साफ़ याद है। उस दिन मम्मी ने बोर्ड पर एक अजीब-सा लेकिन बेहद रोचक विषय लिखा—
“अगर मनुष्य की पूँछ होती तो…”
फिर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
“जाओ, अपनी कल्पना के दरवाज़े खोलो… और इस विषय पर एक निबंध लिखकर लाओ।”
मेरे लिए तो यह जैसे किसी ने कल्पना की दुनिया का दरवाज़ा खोल दिया हो। मुझे वैसे भी अजीब-अजीब और मज़ेदार विचारों के बारे में सोचना बहुत पसंद था। उस रात मैं देर तक बैठी रही। कभी सोचती, कभी हँसती, कभी कुछ लिखती, कभी मिटा देती। मैंने सोचा अगर सच में इंसानों की पूँछ होती तो हमारी दुनिया कितनी अलग होती!
शायद विज्ञापनों में “पूँछ के लिए खास शैम्पू” आते।
मैट्रिमोनियल विज्ञापनों में लिखा होता “लंबी, घनी और खूबसूरत पूँछ वाली दुल्हन चाहिए।”
शादियों में शायद लोग पूँछ बाँधकर फेरे लेते!
और स्कूल में कोई प्रतियोगिता भी होती “सबसे सुंदर पूँछ पुरस्कार।”
मैंने तो कुछ गानों के बोल भी बदल दिए थे। जैसे “तेरे काले काले बाल, लाल लाल गाल, और तेरी लंबी लंबी पूँछ…”
मैंने यह भी लिखा था कि ज़रा सोचो, अगर टीवी के सेलिब्रिटीज़ की भी पूँछ होती तो क्या होता! रैंप वॉक के समय पूँछ का भी एक खास स्टाइल होता। कपड़े भी ऐसे सिलते कि पूँछ को खास जगह और प्राथमिकता मिले। पूँछ के लिए अलग-अलग तरह की ज्वेलरी बनती।
और शायद अख़बारों में भी कभी-कभी “पूँछ से जुड़ी दुर्घटनाएँ” या “पूँछ फँसने की घटनाएँ” जैसी खबरें पढ़ने को मिलतीं!
उस समय न इंटरनेट था, न एआई।
हमारे पास सिर्फ़ हमारी कल्पना थी और एक थोड़ी सी अजीब लेकिन बहुत रचनात्मक सोच की दुनिया।
अगले दिन कक्षा में कई विद्यार्थियों को सामने बुलाकर अपना निबंध पढ़ने के लिए कहा गया। जब मेरी बारी आई तो मम्मी ने बस इतना कहा “आओ, तुम भी पढ़कर सुनाओ।”
मैंने पढ़ना शुरू किया… और कुछ ही मिनटों में पूरी कक्षा हँसने लगी। लोग मेरी कल्पना की दुनिया में खो गए थे।
वह कक्षा मेरे जीवन की सबसे यादगार कक्षाओं में से एक बन गई। इतना ही नहीं, उस पूरे सेमेस्टर में उस निबंध की चर्चा होती रही। आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है – यह सिर्फ़ एक निबंध नहीं था।
यह उस शिक्षक की ताक़त थी जिसने अपने विद्यार्थियों को सोचने, कल्पना करने और अपने विचारों को उड़ान देने की आज़ादी दी।
और शायद यही किसी भी अच्छी शिक्षा की सबसे खूबसूरत शुरुआत होती है।


Leave a Reply