कभी चुप्पी महसूस की है?
आजकल हम हर पल को किसी ना किसी चीज़ से भर देना चाहते हैं।
वॉक पर गए तो हेडफ़ोन लगा लिए।
जिम में पॉडकास्ट चला लिया।
ट्रेन में इंतज़ार कर रहे हैं तो रील्स।
घर में पाँच मिनट मिले तो फोन।
ऐसा लगता है जैसे हम हमेशा connected हैं।
लोगों से।
दुनिया से।
लेकिन क्या सच में?
या फिर हम बस शोर के इतने आदी हो गए हैं
कि ख़ामोशी अब अजीब लगने लगी है।
अब बिना कुछ किए बैठना मुश्किल लगता है।
अकेले रहना भारी लगता है।
हर वक्त दिमाग़ को कुछ चाहिए होता है।
कोई आवाज़।
कोई स्क्रीन।
कोई distraction।
लेकिन कभी कोशिश की है?
बिना म्यूज़िक के चलना।
बिना फोन के बैठना।
समंदर को बस देखते रहना।
बच्चों को खेलते हुए देखना।
या फिर बस कुछ ना करना।
सिर्फ़ आप।
आपके ख़याल।
आपकी feelings।
शुरुआत में बेचैनी होती है।
बार-बार फोन उठाने का मन करता है।
लगता है जैसे कुछ missing है।
फिर धीरे-धीरे
दिमाग़ शांत होने लगता है।
आप खुद को सुनने लगते हैं।
वो बातें जो हमेशा शोर में दब जाती हैं।
वो feelings जिनसे हम भागते रहते हैं।
आजकल हर चीज़ को productive बनाना ज़रूरी हो गया है।
हर मिनट का कोई use होना चाहिए।
कुछ सीखो।
कुछ देखो।
कुछ सुनो।
लेकिन शायद
हर पल को भरना ज़रूरी नहीं होता।
शायद इंसान को भी थोड़ी ख़ाली जगह चाहिए।
जहाँ कोई notification ना हो।
कोई आवाज़ ना हो।
बस थोड़ी चुप्पी हो।
क्योंकि कई बार
सुकून लोगों में नहीं,
शोर में नहीं,
बल्कि अपनी ही ख़ामोशी में मिलता है।


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